सिद्धार्थ चक्रपाणी की कलम से
मीडिया हाउस ब्यूरो

यावदस्थीनि संगाया तिष्ठन्ति हि शरीरिणः।
तावद्वर्ष सहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते।।3-126
मत्स्य पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि जब तक गंगा जी मे प्राणी की हड्डियां रहती है उतने हज़ार वर्ष तक वह स्वर्गलोक में पूजा जाता है। शास्त्रों और पुराणों में अनेक कथाएं हैं जो श्री गंगाजी में अस्थि प्रवाह के महत्व को बताती हैं। मां गंगा पृथ्वी लोक पर आयी ही मानव मात्र को सद्गति देने के लिए।

समुद्र मंथन के समय अमृत की बूंदे हरिद्वार में ब्रह्मकुंड में गिरी जिस वजह से हरकी पैड़ी के जल में अमृत तत्व का विद्यमान होना माना जाता है। पवित्र कुम्भ का स्नान भी यही होता है। देश के प्रत्येक क्षेत्र में निवास करने वाले सनातन धर्मावलम्बी अपने प्रियजनों की अस्थियां यहाँ प्रवाहित करने के लिए आते हैं जो कि हजारों वर्ष पुरानी परम्परा है। किंतु आज भारत सरकार के केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ सत्यपाल सिंह ने यह बयान दिया कि गंगा में अस्थिप्रवाह से प्रदूषण होता है। यह बयान साफ दर्शाता है कि उन्हें शास्त्र और संस्कार परंपरा का तनिक भी ज्ञान नहीं है।

यह सनातन परम्परा पर तो प्रहार है ही, साथ ही मंत्री जी की उस सोच को भी दर्शाता है कि विवादित बयान दो और सुर्खियों में रहो। मंत्री जी नमामि गंगे के तहत कई योजनाओं का शिलान्यास करने हरिद्वार आये थे। अच्छा होता कि नमामि गंगे की विफलता के लिए खेद प्रकट करते, गंगा में गिर रहे सीवर ओर नालों को शीघ्र बन्द करवाने का वादा करते। किन्तु अपनी नाकामी को छिपाने के लिए ओर वर्चुअल वर्ल्ड में प्रसिद्धि बटोरने के लिए सनातन परम्परा से ही खिलवाड़ कर गए। शास्त्रों का ज्ञान होता तो जरूर सोचते कि धर्म और आस्था श्रद्धा का विषय हैं बहस का नही। किन्तु मंत्री जी शायद उस परम्परा को मानते हैं जो सिर्फ सनातन धर्म के विरोध और बुराई की नींव पर टिकी है।

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