प्रदीप गर्ग / मीडिया हाउस ब्यूरो

उत्तराखंड। विश्वविख्यात तीर्थ, जिले से दो काबीना मंत्री, कुंभ जैसे मेलों पर बजट की बौछार, अखाड़ों आश्रमों का नगर, आईआईटी का गौरव तो ​सिडकुल जैसे उद्योगों का हब और फेसबुक पर सैकड़ों एनजीओ की सेल्फी की नजर से मुस्कराता हरिद्वार जिला आज भी अतिपिछड़ा है। केंद्र सरकार ने उधमसिंह नगर के साथ हरिद्वार के अति पिछड़ेपन का खुलासा कर सरकार और राजसत्ता का सुख भोग रहे लोगों को कटघरे में ला खड़ा किया है।

ये जिले तब पिछड़ गये जब डीएम और काबीना मंत्री से लेकर सीएम तक आये दिन विभागीय समीक्षाएं करते हैं। और खबर बनती है कि सब कुछ ठीक है। नगर भले ही अति पिछड़ा घोषित हुआ है लेकिन ये सत्ताधारी धन और रूआब में सर्वोच्च पायदान पर हैं। सत्ताधारी ही क्यों? अधिकतर अफसर भी राजसत्ता के चितेरे हैं सो वे भी उनके नक्शे कदम पर हैं। जिले की कौन सुध ले। होता यही आया है कि ‘न खाता न बही जो साहेबान कहें वही सही’।

अब बुधवार का नजारा देखिए। कलेक्ट्रेट सभागार में नीति आयोग की ओर से मौजूद हैं प्रभारी सचिव भारत सरकार श्रीमती ज्योत्सना सिटलिंग। डीएम दीपक रावत व सीडीओ स्वाती भदौरिया हैं और मौजूद हैं लगभग सभी प्राशासनिक विभागों के प्रमुख अधिकारी।
अब विभागीय अधिकारी पिछड़ेपन पर संसाधनों की कमी और सरकार को आईना दिखा रहे हैं। बानगी देखिए, कह रहे हैं कि साहब कमजोर आय वर्ग के बच्चे नहीं पढ़ पा रहे हैं क्योंकि आठ के बाद फ्री भोजन, किताबें और यूनीफार्म नहीं है। और यह भी कि पूरे शिक्षक नहीं है और विशेषज्ञ तो नाम के हैं। मेडिकल में अफसर कह रह रहे हैं कि बीमारों का डाटा संकलन खराब स्तर पर है कारण कि आशा ही नहीं हैं। यह हाल तब है जब हमारी केंद्र सरकार रोजाना डिजीटल इंडिया की बात करती है। अति पिछड़ापन यहीं नहीं है, पोषण, कृषि, फाइनेंशियल इंक्लुजन, रोजगारपरक कौशल विकास, मूलभूत निर्माण सब जगह कमो​बेश यही हाल है।

यही सब कुछ हुआ लेकिन किसी की कोई जिम्मेदारी और जवाबदेही तय नहीं हुई। पहले भी कभी नहीं हुई। तब भी नहीं जब डीएम से लेकर सीएम तक बैठकें कर विकास की हवाई मीनारें दिखाते आये। हम दलीय प्रतिबद्धताओं से बंधे लोग हैं तो जाहिर है कि उन्होने जो कहा वह मानना हमारा सियासी फर्ज बनता है जिसे हम ईमानदारी से निभाते आये हैं। चाहे उसकी कीमत इस जिले और हमारी पीढ़ियों को किसी भी रूप में क्यों न चुकानी पड़े। हम तो जन्मदिन, विवाह, उद्घाटन ओर मरने जीने में साहब लोगों की शक्ल देख कर खुश होने के आदी जो हो चुके हैं। बड़े साहब लोग इस बात को जान चुके हैं। इसीलिए इस बात पर किसी को शर्म महसूस करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी शायद!

उत्तराखंड की जीरों टॉलरेंस सरकार ने शायद इस मामले में पुरानी लीक पर ही चलने में भलाई समझी। जब दोस्ताना हो तो इतना तो चलता ही है कि आप मेरी पीठ खुजाएं तो मैं आपकी। मिलकर चलना है तो फिर अफसर साहेबान पर जिम्मेदारी और जवाबदेही को बोझ क्यों डालना। खुद भी तो इस सबसे बचना जो है।

साफ है कि जिले में हालात बदतर हैं, योजनाएं बनी जरूर लेकिन भ्रष्टाचार के चलते वे धरातल पर व्यापक प्रभाव नहीं छोड़ पायी। क्लैक्ट्रेट में विभागीय अधिकारियों ने खुद ही इस बात को स्वीकार कर लिया। बड़े साफ मन से, बेहद बोल्ड अंदाज में मानो ये उनके लिए रूटीन है। उन्हें मालूम है कि सातवां वेतनमान में कुछ कटने वाला नहीं। कोई जवाबदेही न पहले थी न अब होगी। तो साहब अब तो जागिए और हरिद्वार और उधमसिंह नगर को बदतर होने से बचाइये। समीक्षाएं हो तो जिम्मेदारी और जवाबदेही भी तय हो आपकी भी और जनसहभागिता की भी।

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