मीडिया हाउस ब्यूरो

हरिद्वार। रंगदारी और अवैध निर्माणों की छाया से तीर्थनगरी हरिद्वार की फिजां में दहशत की धुंध छायी हुई है। आखिर कौन हैं वे लोग जो तीर्थ की इस बदहाली और दहशत के जिम्मेदार हैं? क्या वे जो पुलिस की नजरों में विलेन बने हुए हैं या वे भी जो इनके ​जरिये काले धन का खेल खेलते आये हैं? जी हां इन गुनहगारों में अपरोक्ष रूप से एक विभाग भी बराबर का जिम्मेदार है और वह है हरिद्वार रूड़की विकास प्राधिकरण।

जानिए कैसे……..
हरिद्वार की पहली महायोजना बनी जिसमें वर्तमान समय तक के लिए एक सुनियोजित तरीके से बसाया गया शहर था। बिल्डर लॉबी ने इसके उलट नगर के नक्शे को अपने नफे के हिसाब से परिभाषित कर लिया। एचडीए के कुछ चालाक किस्म के अधिकारियों ने इसे परवान भी चढ़ाया। खेल शुरू हो गया। इसमें पहले ऐसे चालाक किस्म के अधिकारी कर्मचारी सपोर्ट के एवज में पैसा पाने लगे और बाद में तो कई जगह कई प्रापर्टी डीलर और बिल्डर के साथ मिलकर वे हिस्सेदार तक बन गये। कई तो ऐसे अधिकारी भी यहां तैनात रहे जो आये टूटे हुए स्कूटर पर थे और जब यहां से गये तो वे करोड़ो के मालिक, गाड़ी बंगले वाले होकर गये।

ऐसा होता रहा है एचडीए का खेल
पहले अवैध कालोनी कटेगी और निर्माण शुरू हो जायेंगे। हल्ला मचा तो एक दो नोटिस, और ज्यादा से ज्यादा ध्वस्तीकरण का आदेश। उसका तोड़ भी बताया जायेगा कि आप जाइये और कमिश्नर से आदेश ले आइये। नहीं आया तो उसका भी तोड़ है कि हम क्या करें हमारे पास पुलिस बल ही नहीं है। प्रमाण वे हजारों अवैध निर्माणों कीफाइलें हैं जो विभाग की कारस्तानियों की पोल खोलने के लिए काफी हैं।
क्या कभी पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों ने इस ओर ध्यान दिया? नहीं। क्योंकि जिन्होने ध्यान दिया वे तबादले के शिकार हो गये या दबाव में चुप्पी साधकर बैठ गये। और ​जो होशियार टाइप थे उन्होने सिस्टम को भ्रष्ट बना दिया।
विडंबना कि ऐसे कई लोग आज देहरादून और नैनीताल में कोठियां बना कर ऐश कर रहे हैं। हरिद्वार जैसी जगह में ऐसे लोगो के संबंधियों के नाम होटल और बेशकीमती प्रापर्टी है। ये वे लोग हैं जो बिल्डर, नेताओं और चंद अफसरों के कमाउ पूत बने हुए हैं। क्या ये जांच का विषय नहीं होना चाहिए?

अ​ब हुआ ये कि……
इन चालाक टाईप के अधिकारियों और कर्मचारियों ने कुछ नये बिल्डर पर हाथ रखकर उन्हें आर्थिक अपराध का रास्ता दिखाया। उन्हें बताया कि कानून और नियम कायदे सब कुछ पैसे में खरीदा बेचा जा सकता है। आसान रास्ते से पैसा कमाने की होड़ ने नगर को बरबादी की ओर धकेलने का काम किया। नतीजा यह निकला कि पूरा शहर देखते ही देखते चंद बरसों में अवैध निर्माणों की चपेट में आ गया।
विरोध के स्वर उठे तो पैसे ने अपना आपराधिक चरित्र दिखाना शुरू कर दिया। पैसा आया तो अपराध और उससे जुड़े चेहरों का विकृत रूप भी सामने आ गया। तो भी हुआ क्या? खेल बदस्तूर जारी रहा और जारी है। इन चालाक अधिकारी कर्मचारियों ने ही पर्दे के पीछे से सिखाया कि जो ज्यादा जबान खोले, उन्हें सबक सिखवा दो। क्या इस पूरे प्रकरण में एचआरडीए के कुछ नये पुराने कर्मचारियों और अधिकारियों की जांच नहीं होनी चाहिए?

सोचिए, क्या ऐसा ही था हमारा तीर्थ
ऐसा तो नहीं था हमारा कनखल हरिद्वार, हर गली मौहल्ले और चौराहे पर लोग खुद से ये सवाल करते हैं और सिस्टम को कोसते हुए नजर आते हैं। वास्तव में दहशत का ये मंजर तीर्थनगरी ने पहली बार देखा है। रंगदारी और दहशत के लिए वे लोग तो जिम्मेदार हैं ही जो परोक्ष रूप से इससे जुड़़े रहे लेकिन एचडीए की भूमिका भी इसमें बराबर की है। अगर यह विभाग शुरू से ही अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निर्वाह करता तो तीर्थ नगरी आज दहशत की आग में न सुलग रही होती।

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