मीडिया हाउस ब्यूरो

हरिद्वार। स्थान वन विभाग का रेंज कार्यालय… कछुओं की तस्करी के आरोप में पकड़े गये दो युवक…और यहां मौजूद भाजपा के कई नेता और कार्यकर्ता। एक भाजपा नेता हंसते हुए कहते हैं कि यदि मंत्री जी के बंदे होते तो केस ही दर्ज नहीं होता, गिरफ्तारी तो दूर की बात है। ये भाजपा नेता आजकल मंत्री जी के बेहद नजदीकी बताए जाते हैं। बात उनके विरोधी समर्थक की थी सो उन्होने कहा सुना और घर चले गये लेकिन वे अपने पीछे कई सवाल छोड़ गये।

सवाल उन कार्यकर्ताओं के सामने है जो भाजपा को सपोर्ट करते हैं लेकिन वे कहीं मदन तो कहीं निशंक या फिर सतपाल में बंट कर रह गये हैं। सवाल है उन छोटे नेताओं का जो अपने आका के लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं लेकिन वक्त पड़ने पर पार्टी के अंदर की फूट उन्हें अर्श से फर्श पर ला पटकती है। सवाल यह भी कि इन सबसे अच्छे और बुरे का भेद ही नेताओं ने खत्म कर दिया। सवाल ये भी कि संकट के समय किसी भी पार्टी कार्यकर्ता के लिए अपनों की बेरूखी ही जानलेवा होती है।

भले ही काबीना मंत्री मदन कौशिक और पूर्व सीएम निशंक अपने समर्थकों से ज्यादा कुछ न कहते हों लेकिन अपने नंबर बढ़ाने के गेम ने पार्टी में ही खेमेबंदी को आसमान तक पहुंचा दिया है जिसका खामियाजा अंतत: निचले कार्यकर्ता को ही भुगतना होता है। सेनापतियों और मंत्रियों की फौज तो मौज में ही रहती आयी है।

हंगामा क्यों है बरपा….
एक बात स्पर्श गंगा टीम की। वन विभाग के रेंज कार्यालय में ​गिरफ्तार किए गए जिस व्यक्ति के लिए संस्था के प्रमुख शिखर पालीवाल और उनके समर्थक वहां पहुंचे थे वह स्वाभाविक था। किसी भी संस्था के लिए यह यकीन करना एकदम से मुश्किल ही होता है कि उनका एक सदस्य इस तरह की गैर कानूनी ग​तिविधि में शामिल था। वन विभाग के झोल से ये अभी आरोप हैं और इनका निपटारा कानून सम्मत ही होना है। लेकिन एक दो सदस्यों की गलती ​के लिए पूरी संस्था को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। किसी भी संस्था के पास ऐसा कोई साधन नहीं कि वह यह पता लगा सके कि अमुक व्यक्ति सही होगा यह अमुक गलत। स्पर्श गंगा इसका अपवाद नहीं है। उसके किए जाने वाले कार्यो का भी अवलोकन कर ही हमें इस संबंंध में कोई धारणा बनानी चाहिए। लेकिन सवाल फिर वहीं का वहीं कि अपने ही दल के लोगों से कोई लड़े तो कैसे?

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