प्रख्यात चिकित्सक डा. विजय वर्मा की कलम से
मीडिया हाउस ब्यूरो

ॐ प्रत्येक समाज अपने को सुदृढ़ रखने के लिए,एक धर्म का अनुसरण करता है। प्रत्येक धर्म में कुछ पर्वों के नाम पर कुछ सांस्कृतिक उत्सव होते हैं। जो उसको उसके मूल स्रोत की याद दिलाते हुए, अपनी आतंरिक व बाह्य प्रकृति को शुद्ध करने का अवसर प्रदान करते हैं। उस पर्व को देखकर ही, उस समाज की सभ्यता का आकलन किया जा सकता है। पर्व का उद्देश्य यह भी होता है कि,जब समय के अंतराल के साथ समाज में दूषण फ़ैलने लगे तो,उस पर्व की महत्ता उसे उस दोष से निवृत्त होने की प्रेरणा दे एवं समाज पुनः उन्नति के पथ पर अग्रसर हो। परन्तु जब समाज का दूषण उस पर्व की मौलिकता को ही खोने की ओर अग्रसर हो जाए तो,यह स्थिति पूरे समाज को पतन की ओर अग्रसर होने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। आज प्रत्येक धर्म के पर्वों को मनाने में मौलिकता का सर्वथा अभाव ही हो गया है।

खासकर हिन्दू वैदिक धर्म; जो वैदिक व पौराणिक काल के अनेक प्रसंगों को भिन्न-भिन्न रूप में साल की प्रत्येक ऋतु में, उस ऋतु के अनुरूप पर्व का अनुष्ठान करने के लिए प्रेरित करता है, आज नए युग के विध्वंसकारी रूप का शिकार हो गया है। वैदिक व पौराणिक काल में प्रत्येक पर्व का उद्देश्य प्रकृति की पूजा रहा है। प्रकृति की पूजा को ही आज की वैज्ञानिक भाषा में, पर्यावरण के नाम से जाना जाता है| प्रकृति- पूजा यानि अपनी आतंरिक व बाह्य प्रकृति की शुद्धता। वर्षा-ऋतु के आगमन के बाद एवं शीत-ऋतु के आगमन के पूर्व, आन्तरिक–प्रकृति की शुद्धता लिये नवरात्र की साधना में आतंरिक ऊर्जा का संचय किया जाता है तथा बाह्य प्रकृति की शुद्धता के लिए दीपावली की तैयारी में, वर्षा ऋतुमें उत्पन्न अपने आवास के चारों ओर अनेक पौंधों व कीड़े-मकौडों की सफाई की जाती है तथा दीपावली की रात को दीपों की कतारों से सजाते हैं एवं दीपों की यह ज्वालाएं अनेक कीट-पतंगों को नष्ट कर,वातावरण में उत्पन्न हुए अनेक जीवाणुओं को भी नष्ट कर देती है|साथ ही ऋषियों की उद्घोषणा तमसो मा ज्योतिर्गमय का सन्देश भी देती है।

यह तो हुआ इसका वैदिक व पौराणिक सन्देश। परन्तु दुर्भाग्य से इस पर आधुनिकता का अत्यंत कुत्सित प्रभाव पड़ गया है, जिसके कारण ध्वनि-विस्तारक यंत्र (DJ)आदि तथा पटाखों का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। ध्वनि-विस्तारक यंत्र से तो प्रत्येक पर्व में आतंरिक साधनाओं में तो बाधाएं होती ही हैं साथ ही यह इस युग के बड़े राक्षस के रूप में उभरकर सामने आया है एवं प्रत्येक जीव यहाँ तक कि पेड़ पौधों पर भी अपना दुष्प्रभाव डाल रहा है। आज भारत वर्ष में ध्वनि-प्रदूषण एक गंभीर समस्या बनाता जा रहा है। इससे नाना प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न हो रही हैं। जैसे बहरापन,चिडचिडापन,अनिद्रा,रक्तचाप(BLOOD PRESSSURE)मधुमेह,केंसर आदि-आदि। इसके साथ ही बद्रीनाथ जैसे पवित्र व शांतिपूर्ण धाम में भी दीपावाली जैसे पर्व पर पटाखों का प्रयोग अत्यधिक मात्रा में होने लगा है। पिछले साल दिल्ली तो गैस चम्बर ही बन गयी थी। तीन दिन तक दिल्ली के नागरिक परेशान रहे।

धर्म का तो स्वरूप ही ऐसा होना चाहिये कि वह क़ानून बनाने में सहायक हो। परन्तु जब धर्म के नाम पर अधार्मिक कृत्य बड़ जाये एवं समाज अनियंत्रित हो जाए तो, क़ानून के माध्यम से समाज को नियंत्रित कराना नितांत आवश्यक हो जाता है। ध्वनि-प्रदूषण एवं वायु-प्रदूषण से सम्बंधित अनेक कानून बने हुए हैं एवं इनका सही रूप में पालन कराना प्रशासन का उत्तरदायित्त्व है। माननीय उच्चतम-न्यायालय का आदेश जो N.C.R. के लिए आया है, स्वागत योग्य है|परन्तु जिस नियम के चलते वह दिल्ली व N.C.R में लागू किया गया है उसी नियम के तहत पूरे देश में लागू किया जाना चाहिये। साथ ही यह नियम पूरे वर्ष भर लागू किया जाना चाहिये। उच्चतम-न्यायालय का यह आदेश केन्द्रीय-प्रदूषण-नियंत्रण-बोर्ड के नियम को लागू कराने के लिए पहले से ही प्रभाव में है एवं पूरे वर्ष भर इसका पूरे देश में सख्ती के साथ पालन करवाना प्रशासन का उत्तरदायित्व है।

जिस प्रकार किसी पेड़ को हरा भरा रखने के लिए उसका सिंचन जरूरी होता है ठीक उसी प्रकार समाज को सुदृढ़ रखने के लिए उसके त्यौहारों के मूल भावों का सिंचन अत्यंत जरूरी है। आज त्यौहारों का मूल उद्देश्य ही नष्ट हो गया है। साथ ही बाह्याडम्बर उस त्यौहार को ही प्रदूषित कर रहा है। अतः त्यौहारों का अपने मूल रूप में ही रहना जरूरी है।

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