मीडिया हाउस ब्यूरो

रियल एस्टेट(प्रॉपर्टी ) प्रोफेशनल शिवम सडाना

रियल एस्टेट के लिए सरकार रेरा कानून ले आयी है। इस कानून को लेकर रियल एस्टेट कारोबारियों और आम लोगों में बहुत सी भ्रांतियां भी हैं। इन्हीं सब बातों को लेकर यह लेख लिखा गया है।  जानिए रियल एस्टेट(प्रॉपर्टी ) प्रोफेशनल शिवम सडाना से…….. 
* फ़्लैट या संपति के बुकिंग की राशि: सामान्यतः जब हम बुकिंग करते है तब डेवलेपर्स, जो भी हमारी फ़्लैट को खरीदने की पूरी राशि होती है, हमे उसका 10% तक की राशी को भुगतान करने को कहते है. साथ ही वो अग्रिम राशि की भी मांग करते है, लेकिन रेरा अधिनियम आने से 10% से अधिक भुगतान के लिए डेवलेपर्स को अब समझौता करना पड़ेगा.

* प्रोजेक्ट के वितरण में देरी पर मुआवजा:
जो भी खरीदार घर को खरीद रहे है अगर उन्हें आवंटित फ़्लैट या घर में किसी भी तरह के निर्माण कार्य में दोष दिखता है, या फ़्लैट का आवंटन समय के अनुसार नहीं होता है, तो डेवलेपर्स या बिल्डर रेरा अधिनियम के तहत दोषी पाए जायेंगे और उन्हें इसके लिए कुल राशि के ब्याज के साथ जुर्माना भी देना पड़ेगा.

* परियोजना की गुणवता:
रेरा अधिनियम के तहत बिल्डिंग में किसी भी तरह की खराबी के लिए 5 साल की वारंटी के तहत उसमे सुधार कराने की जिम्मेदारी बिल्डर की होगी.

* परियोजनाओं का पंजीकरण:
रेरा कानून के तहत जुलाई 2017 तक सभी प्रोजेक्ट का पंजीकरण हो जाना चाहिए था . यह पंजीकरण प्रत्येक राज्यों के द्वारा स्थापित स्वयं के नियामक प्राधिकरण में कराना होगा, यह प्राधिकरण सभी तरह के परियोजनाओं को  नियंत्रित रखने की जिम्मेदारी रखता है. अगर कोई भी बिल्डर रेरा के प्राधिकरण में पंजीकरण नहीं कराता है तो वह परियोजना की मार्केटिंग नहीं कर सकता है. इसके साथ ही विनियामक प्राधिकरण के साथ पंजीकृत होने के बाद बिल्डर को प्राधिकरण की वेवसाइट पर ऑनलाइन परियोजना की सभी विवरणों के साथ ही उससे जुडी अन्य जानकारियों को भी अपडेट करना होगा. इन सभी विवरणों के ऑनलाइन जानकारी मिलने से खरीददारों को स्टिक जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलेगी, जिससे वह परियोजनाओं में निवेश करने से पहले विचार कर पायेगा.

* परियोजना की अवधि : कोई भी परियोजनाएं जो पूरी नहीं हुई है या अभी चल रही है, इन सब की जानकारी बिल्डर को प्राधिकरण को देनी होगी. साथ ही जो मूल योजना है, अगर उसमे किसी भी तरह का परिवर्तन बाद में होता है तो उन सब की जानकारी देनी होगी. बिल्डर को परियोजनाओं की समाप्ति की समय सीमा की जानकारी भी प्राधिकरण को प्रदान करनी होगी. साथ ही बिल्डरों को ग्राहकों से प्राप्त एस्क्रो अकाउंट में 70% तक का पैसा ट्रांस्फर करना होगा, इससे इस बात का पता चल जायेगा की बिल्डर जिस परियोजना के लिए पैसा ले रहा है, वो उसी परियोजना पर ही खर्च कर रहा है या नहीं.

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