मीडिया हाउस ब्यूरो

नई दिल्ली। कांग्रेस को गुजरात की हार से सबक लेने की जरूरत है। विशेषकर उसे भाजपा से सीखने की दरकार है कि आखिर कैसे वह गुजरात का हारता हुआ मैदान आखिर वक्त पर फतह कर गयी। कड़ी टक्कर देने के बाद गुजरात हार जाने वाली कांग्रेस को सांग​ठनिक स्तर के साथ अपने नेताओं के आत्मघाती बयानों पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है।

माना कि गुजरात में राहुल गांधी ने तीस सभाओं के साथ आक्रामक प्रचार कर अपनी सीटे बढ़ाने में कामयाबी ले ली तो भी सत्ता से वह बहुत दूर रह गये। आखिर क्या हैं वे फैक्टर जिनकी वजह से कांग्रेस को हार मिली और जिस पर उसे करना चाहिए मंथन।

पहला कारण सांगठनिक रूप से पार्टी का कमजोर होना। राहुल गांधी की टीम यदि चाहे कि वह तीन महीने धुंआधार प्रचार करे और वह जीत जाये तो यह हवाबाजी ही कही जायेगी। कमोबेश पूरे देश में कांग्रेस इसी हवाबाजी का शिकार है। भाजपा ने मुश्किल और कड़े मुकाबले में यदि जीत हासिल की तो इसका श्रेय उसके बूथ स्तर पर तैयार संगठन को जाता है।
दूसरा कारण पटेल वोटों पर आश्रित होकर अपने परंपरागत वोट बैंक की ओर से हट जाना। आदिवासी बैल्ट जो कांग्रेस मय थी आज उससे छिटक कर भाजपा की ओर चली गयी। कांग्रेस हार्दिक पटेल पर आश्रित होती गयी। हार्दिक पटेल आरक्षण के पाटीदारों की नाराजगी को नहीं भुना पाये। वे अंत तक भ्रम में रहे और भाजपा ने इसी भ्रम का फायदा उठाया। हुआ ये कि न खुदा ही मिला और न विसाले सनम।

तीसरे जीएसटी और नोटबंदी पर राहुल की कांग्रेस ने खूब जमकर आलोचना की थी। लेकिन शहरी क्षेत्र के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी कांग्रेस को अपेक्षित सीटें न मिलना इस बात का संकेत है कि वह रैलियों में भीड़ जुटाकर भी उसे वोट बैंक में तब्दील नहीं कर पायी। यानि साफ है कि वह अपने प्रति लोगों को विश्वास नहीं दिला पायी।
चौथा कारण यह रहा कि मुकाबला कड़ा था और उलट फेर के कयास जोरों पर थे। लेकिन दूसरे दौर से पहले ही कांग्रेस के मणिशंकर अययर ने मोदी के लिए ‘नीच’ शब्द का आत्मघाती बयान देकर मानो भाजपा को संजीवनी दे दी। तय हो गया था कि कांग्रेस को इसका बड़ा नुकसान होगा। रही सही कसर उस पाकिस्तान वाली डिबेट क्लिप ने कर दी। मोदी गुजरात से हैं और उन्होने नीच शब्द को बड़ी चतुराई से गुजराती अस्मिता से जोड़कर नाराज गुजरातियों के वोटों को भावनाओं में समेट लिया।

साफ है कि कांग्रेस की टीम राहुल ने गुजरात की चुनावी जंग बेहद आक्रामक अंदाज में लड़ी लेकिन जिताउ टीम का अभाव और सांगठनिक कमियों के चलते वे हार गये। यह भी तय है कि यदि कांग्रेस ने इस ओर अभी भी ध्यान नहीं दिया तो वे 2019 का चुनाव में बेहतर करने की आशा भी नहीं कर सकते। क्योंकि सामने ताकतवर सरकार का वह मोदीमय चेहरा है जिसके लिए जीत के बाद तो जीत है ही, हार के बाद भी जो जीत का पूरा माद्दा रखता है।

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